जय बजरंग बली की...भाई राजमणिजी आप ने जो बात कही है,उस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है। यह वैसै ही सवाल है कि आत्मा होती है या नहीं? या अच्छा क्या है और बुरा क्या है? माफी मांगना उचित है या कि अपनी चूक को छिपाने का जरिया? या कि बहुत दिनों से अपनी महफिल में शरीक न होने का मलाल? ये ऐसा मुद्दा है जिसे न तो दो आड़ी लकीरों से काटा जा सकता है और न तुरंत हां,हां बाजी की जा सकती है। खैर बात चली है तो दूर तलक जाएगी। और उपना रंग दिखाएगी। या फिर खामोशी की बर्फ में जम कर कुल्फी बन जाएगी। इंतजार कीजिए। खैर हनुमान जयंती मुबारक हो। एक गजल पेशे खिदमत है-है सहर
किरणों के नर्म लिबासों में उछलती है सहर
सतह पे झील के हौले-से टहलती है सहर
सजी हो थाल में पूजा के भावना की तरह
मन की कुटिया में किसी दीप-सी जलती है सहर
उलझ के पांव बहुत डगमगाए कोहरे में
पकड़ के हाथ हवाओं के संभलती है सहर
संवर के रात की सीपी में मोतियों की तरह
सफर को नर्म घरौंदों से निकलती है सहर
सभी में होता है मासूम-सी खुशबू का गुमां
कि जब भी सहमी-सी लड़की-सी मचलती है सहर
नजाकतों को नीरव समझ भी सकते हैं
दबे जो पांव खयालों में गुज़रती है सहर।
पं. सुरेश नीरव
No comments:
Post a Comment