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Monday, November 16, 2009

आदरणीय कर्नल विपिन चतुर्वेदीजी,
ग्वालियर को ले कर आपकी लिखी ये पंक्तियां अमर हैं। मैं गली बार ग्वालियर आप के साथ ही जाऊंगा। बहरहाल आपका अपने शहर के प्रति लगाव काबिले तारीफ है।

अरम्य ग्वालियर देश हमें तू प्राणों से भी प्यारा है


जीवन की आकुल घरीओं का तू ही बस एक सहारा है ।

हम देश विदेश कहीं भी हों होगा पर तेरा ध्यान सदा।

तेरा ही पुत्र कहाने में होगा हमको अभिमान सदा।

मकबूलजी
अंसार कंबरी के दोहे बहुत सहज और सरल शैली में अपना पूरा प्रभाव छोड़ते हैं। खासकर ये बाले-
 
हर कोई हमको मिला, पहने हुए नक़ाब


किसको अब अच्छा कहें, किसको कहें ख़राब।

सुख-सुविधा के कर लिए, जमा सभी सामान

कौड़ी पास न प्रेम की, बनते हैं धनवान।
मुनीन्द्र ऩाथ चतुर्वेदी जी,
 काग़ज़ के इक ढेर में ढूंढ रहे क्या यार
लव लैटर कैसे मिले किया नहीं जो प्यार
नंबर चोखे पाय के अफसर बन गए आप
नहीं दिया करने कभी मुनि नाम ने पाप
पूरे जीवन में रहें आप सदा ही टॉप
प्रदीप शुक्लजी,
आपकी पुस्तक समीच्छा और आमंत्रण दोनों ही लाजवाब हैं। बधाई।
राजमणिजी,
बहुत दिनों बाद आपके प्रकट होने की बधाई। साथ ही रचनात्मक सहयोग के लिए भी शुक्रिया..
जय लोक मंगल
पं. सुरेश नीरव

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