आज ब्लॉग पर कर्नल विपिनजी की ग्वालियर पर लिखी कविता बेहद अच्छी लगी। राजमणिजी ने शुक्लजी की बड़ी अच्छी कविता दी है.इन पंक्तियों का तो जवाब नहीं
यूँ तो हर पाँव
अपने निशान छोड़ता है
पर, हर निशान
स्थाई और अनुकरणीय नहीं होता
क्या कभी तुमने मुड़कर देखा है
कि तुमने
अपने पाँवों के निशाँ
कहाँ छोड़े थे-
मिट्टी के ढेर या
रेत की कगार में?
यदि थे रेत पर
तो हवा ने मिटा दिए होंगे
यदि थे मिट्टी पर
तो बौछार से धुल गए होंगे।
भाई अनिल गुप्ता ने राग मराठी के जरिए राज ठाकरे की खासी खबर ली है। और उनकी टुच्ची राजनीति को बेनकाब किया है। प्रदीप शुक्लजी ने जो न्योता दिया है उस पर विचार किया जाना चाहिए। और नीरवजी तो जबरदस्त हज्जाम हो ही गए हैं ये बात अलग है कि उन्हें खुद अपने बाल कटवाने की फुर्सत नहीं है। कभी न कभी, कहीं न कहीं, कोई न कोई, हजामत इनकी बनाएगा,तभी मजा कुछ आएगा..
ब्लॉग पर लिखन्वाले बढ़ रहे हैं यह शुभ संकेत है।
जय लोक मंगल
मधु मिश्रा
No comments:
Post a Comment