आदरणीय नीरवजी.आपकी उपलब्धिपूर्ण ग्वालियर यात्रा के लिए आपको अनेक बधाइयां। यह निश्चित ही हर्ष की बात है कि जहां आप का बाल्यकाल बीता वहां आप सम्मानित हों ऐसी उपलब्धि तो भगवान कृष्ण को भी उपलब्ध नहीं हुऐ न्हें मथुरा छोड़कर द्वारिका जाना पड़ा तभी द्वारिकाधीश हुए और वापस मथुरा नहीं आ पाए। आप अपने शहर के ग्वाल-बालों में द्वारिकाधीश बने और तीसरी-चौथी बार बने यह गौरव की बात है। आपको बधाई।
प्रदीप शुक्ला और राजमणिजी की मेहनत को सलाम। और मकबूलजी की तो बात ही न्यारी है। क्या कहूं। शब्द नहीं हैं मेरे पास। मुनीन्द्रजी के कागजों के ढेर में हसीनाओं के चंद खतूत भी बरामद नहीं हुए,यह उनके उजले और साफ-शफ्फाफ चरित्र को दर्शाता है हां अगर वो कवि होते तो ढेर ही प्रेमचिट्ठियों का होता। उनके विदेश यात्रा के संस्मरण लाजवाब रहे। बधाई
भगवान सिंह हंस
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