आज कई दिनों या यूँ कहूं कि कई हफ्तों बाद लोक मंगल पर जा पाया . कारण पहले, दिल्ली से बाहर पूर्वोत्तर की यात्रा ,फिर घर और दफ्तर में नेत देवता की नाराजगी. आज जब लोक मंगल पर पढ़ना शुरू किया तो ह्जामत ने ऐसा रिझया कि नीचे तक उतरता ही चला गया . सुरेश जी का यह काम क्रांतिकारी है ... उनके इस काम पर भाई आर .पी शुक्ल की कविता सटीक लगती है , खैर , कविता और काम दोनों का मज़ा लीजिए
यूँ तो हर पाँव
अपने निशान छोड़ता है
पर, हर निशान
स्थाई और अनुकरणीय नहीं होता
क्या कभी तुमने मुड़कर देखा है
कि तुमने
अपने पाँवों के निशाँ
कहाँ छोड़े थे-
मिट्टी के ढेर या
रेत की कगार में?
यदि थे रेत पर
तो हवा ने मिटा दिए होंगे
यदि थे मिट्टी पर
तो बौछार से धुल गए होंगे।
वह देखो मेरे पैरों के निशान
सदियों बाद आज भी चट्टानों पर अंकित हैं
ऐसे निशाँ मात्र चलने से नहीं
चलने की शैली से बनते हैं
और जिस दिन
तुम्हें चलने की शैली आ जाएगी
मेरे दोस्त!
तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करोगे।
प्रस्तुति –राजमणि
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