राज ठाकरे का सन्निपात के रोगी की तरह अनर्गल प्रलाप फिर से शुरू हो गया है। स्टेट बैंक में भरती के लिए मराठी लोगों को प्राथमिकता देने का पत्र लिख डाला लेकिन ठाकरे साहब इससे पहले जरा ये भी जान लेते कि वो जो कर रहे हैं, संविधान में देश के नागरिकों को दी गई 'सामान अवसर' की अवधारणा के विरूद्व है। कोई भी नियुक्ति स्थापित मानकों और पात्रता के आधार पर की जाती है। अगर मराठी लोग दूसरे लोगों से ज्यादा योग्य होंगे तो जॉब उन्ही को मिलेगी , इसमे ठाकरे की वकालत की जरूरत ही नहीं है। लेकिन अगर वो मानक स्तर पर ही खरे नहीं उतर पाए तो उन्हें जॉब क्यों मिले और दूसरे लोगों को अपनी आजीविका कमाने से रोकने वाले राज होते कौन हैं। आख़िर राज की हस्ती भारतीय राजनीति में है क्या। महज एक क्षेत्रीय दल की, जो हिन्दी विरोध पर ही जिन्दा है। अगर हिन्दी का मुद्दा न हो तो राज के पास है ही क्या। सत्ता की भूख में उत्तराधिकार के मुद्दे पर बाबा साहेब को छोड़ कर अपनी पार्टी बनाने इस शख्स की पॉलिटिक्स मराठी लोगों को उकसा कर अपने लिए वोट बटोरने की है। इस बात को हर कोई जनता है, पर अफ़सोस है कि देश के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश करने वाले राज के खिलाफ न महाराष्ट्र सरकार और न ही केन्द्र कोई कदम उठाते हैं।
अब कुछ सीधी बातें, राज साहेब बीमार होने पर क्या महाराष्ट्रियन डॉक्टर से ही इलाज कराएँगे। क्या महाराष्ट्र में मराठियों द्वारा बना कपड़ा ही पहनेगे, बच्चों को मराठी स्कूल में ही भेजेंगे, मराठी किसानो का पैदा किया अनाज ही खायेगे। मराठी फिल्म्स ही देखेंगे, मराठी बैंक में ही खाता खोलेंगे, हमेशा मराठी वस्त्र ही धारण करेंगे, हमेशा मराठी बोलेंगे, खैर छोडिये, सिर्फ़ इतना बता दीजिये, आज तक आपने देश की तो छोडिये, आम मराठी का क्या भला किया है।
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