आधी रात सी अलसाई
ठहरी सी ज़िन्दगी की
जमी सी झील में
छिटककर आ गिरे
सतरंगी सपनों के
लहराते कतरे !
सपनों के वृत्त बने
अर्धवृत्त- पूर्णवृत्त
उनके भी अनुवृत्त
फिर
पेशानी पर खिंच आयी
रेखाओं से वलय
फैलते गए दूर तक
वहां तक
जहाँ से
जंगली अंधेरों को चीर कर
निकलती है
सपनीली भोर
और -मैं
वलयों की
अंतहीन रेखाओं के
अन्तिम छोर पर बैठा
सोच रहा .............
...कि रेखाएं जैसे ही सिमटें
और शांत हो
सपनों का समंदर
कि
उछालूँ एक और पत्थर
आशा का
ठहरे से सपनों में ,
...फिर
सपनों के वृत्त बनें
अर्धवृत्त- पूर्णवृत्त
उनके भी अनुवृत्त
और मैं
वलयों के पार बैठ
गिनता रहूँ
सपनों को ...
वृत्तों को ...
वलयों को...
एक...दो...तीन...चार ......!
- पुरुषोत्तम
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