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Wednesday, December 16, 2009

सपना -2

लोक मंगल पर अपनी रचना पोस्ट करने से पहले १४ दिसम्बर को तत्काल स्कीम (उसी दिन ) के तहत लिखी गयी पं.सुरेश नीरव की कालजयी ग़ज़ल के लिए निर्विवाद साधुवादऐसी ही ग़ज़लें लिखते रहे तो बड़ों बड़ों की छुट्टी कर देंगेअब अपनी रचना के बारे मेंपिछले सप्ताह सपना -सिरीज़ की तीन रचनाओं में से पहली रचना पेश की थीआज दूसरी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ :

आधी रात सी अलसाई
ठहरी सी ज़िन्दगी की
जमी सी झील में
छिटककर गिरे
सतरंगी सपनों के
लहराते कतरे !

सपनों के वृत्त बने
अर्धवृत्त- पूर्णवृत्त
उनके भी अनुवृत्त
फिर
पेशानी पर खिंच आयी
रेखाओं से वलय
फैलते गए दूर तक
वहां तक
जहाँ से
जंगली अंधेरों को चीर कर
निकलती है
सपनीली भोर
और -मैं
वलयों की
अंतहीन रेखाओं के
अन्तिम छोर पर बैठा
सोच रहा .............
...कि रेखाएं जैसे ही सिमटें
और शांत हो
सपनों का समंदर
कि
उछालूँ एक और पत्थर
आशा का
ठहरे से सपनों में ,
...फिर
सपनों के वृत्त बनें
अर्धवृत्त- पूर्णवृत्त
उनके भी अनुवृत्त

और मैं
वलयों के पार बैठ
गिनता रहूँ
सपनों को ...
वृत्तों को ...
वलयों को...
एक...दो...तीन...चार ......!


  • पुरुषोत्तम

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