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Wednesday, December 16, 2009



हजामत
भैया राजमणिजी बहुत दिनें से मन था कि आपके स्निग्ध-सचिक्कन कांतिमान कपोलों को अपने संवेदनशील उस्तरे के संपर्क में लाऊं। मेरा उस्तरा लाख बेजान सही मगर नाहक करूं हजामत तो इसका बदन दर्द करता है। इसलिए नाहक हजामत करने का सवाल उठता नहीं है। आप लोकमंगल के खानदानी सदस्य हैं और इसके कुनबे के हर सदस्य का यह संवेधानिक अधिकार है कि वह अपनी हजामत बनवाए और मेरा तो हक है ही कि मैं जिसकी चाहूं उसकी हजामत बनादूं। खूदा ने मुझे एक बेशकीमती उस्तरा जो बक्शा है। हां तो जनाब  राजमणिजी आप आजकल नाराजमणि हो गए हैं। क्योंकि आपकी नागा बढ़ती जा रही है। इसलिए आप नागमणि भी कुछ-कुछ हो रहे हैं। इतनी बेहतरीन ग़जलों का जो जखीरा आप के पास है उसे आपने कहां भूमिगत कर दिया है। लोकमंगल के सभी साथियों को इसकी बड़ी शिकायत है। आपने तो उस दौर की याद दिला दी जब चाय लोकप्रिय नहीं थी तब चाय कंपनियों ने लोगों को मुफ्त चाय पिला-पिलाकर उन्हें चाय की लत लगा दी और जब उन्हें इसकी आदत पड़ गई तो उन्होंने चाय की कीमत लगाना शुरू कर दी। आपने भी कुछ ऐसा ही किया है। पहले लोगों को बढ़िया माल परोसते रहे और जब लोगों को इसकी लत लग गई तो आप ने नखरे दिखाने शुरू कर दिए। ये कौन-सी इनसानियत है आपकी। हम इसे इम्मोशनल ब्लैकमेल मानते हैं। और साब ब्लैकमेल मोशनल हो या इमोशनल आखिर है तो जघन्य जरायम ही। हे राष्ट्रीय रचना-अभिलेखागार के अंतर्राष्ट्रीय रखैया,अच्छा नहीं है आपका ये रवैया। हे गीत,दोहों और ग़ज़लों के गवैया,कहां पर डुबो रहे हैं आप अपनी लेखनी-सुलेखनी की नैया। लगता है आपके कंप्यूटर को स्वाइन फ्ल्यू हो गया है। और माउस को मलेरिया। या फिर आप कहीं घुमंतू हो गए हैं। यह पोस्ट पढ़ते ही अपनी-राजी-औ-नाऱाजी की खबर भेजना। हजामत के बाद भी लोग आपको पहचान ही लेंगे। हमने इसीलिए आपकी हल्की ही हजामत बनाई है। बंदा बहुत शरीफ नाई है। वरना ऐसी हजामत भी हम बना सकते थे कि आप देवानंद से शेट्टी और डेविड के कुलगोत्र के प्राणी दिखाई देते। हजामत पसंद आए तो बतौर फीस ब्लॉग की गुल्लक में अपनी पोस्ट डाल देना। ओ.के... अब थोड़ा डीटॉल लगा दूं। थोड़ कट भी नहीं लगा फिर भी ताकि नाई की महक आप के नथुनों में उछल-कूद करती रहे।
पं. सुरेश नीरव

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