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Saturday, December 12, 2009

नई किताबें



आइए आज बात करते हैं एक नई ताजी किताब की
किताब-तत्पश्चात (गीत संग्रह)
कवि-पं. सुरेश नीरव
प्रकाशक-सापेक्ष प्रकाशन,
गोविंदपुरम, गाजियाबाद
मूल्य-150 रूपये
विदेशों में-7 डॉलर

लंबे समय से मंच से और मंच से बाहर यानी किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में कविता कर रहे और जमे हुए कवि पं. सुरेश नीरव की ये किताब हाल ही छपकर आई है, जो उनके लिखे 56 गीतों का एक संग्रह है ।
कवि का कहना कि- इस संग्रह में मेरी उस उम्र की रचनाएं है, जिसे गीत, ग़ज़ल कुछ भी कहना महज़ एक पूरवाग्रह ही समझा जाना चाहिए । बस कुछ सपने हैं, जिनकी सौंधी-सौंधी महक चेतना को एक मादक रूमानियत से सराबोर कर देने की कुव्वत आज भी रखती है । किशोरवय और कविता की अंतरंगता के संधि-स्थल पर टहलती-महकती और दमकती संवेदनाओं का ये एक गुलदस्ता है ।
संग्रह में शामिल उनकी एक रचना-तुम कविता कल्याणी की ये पंक्तियां-
मेरे एकाकी जीवन को
तुमने मधु का वरदान दिया
मेरे प्रशांत उर-सागर में
लहरों का बर तूफान दिया ।
मेरे प्राणों की तुम प्रीते! युग-युग से जानी-पहचानी!

कवि का कविता से रिश्ता कितनी सहजता और मजबूती से दिखाती हैं । वहीं यह कविता- अरे यदि मैं पंछी होता ! में पं. नीरव की ये कल्पना देखिए-
किसी कोमल कर से सहसा
पकड़ते ही दृग खुल जाते,
फड़फड़ा पर उड़ जाता छूट
उखड़ कुछ पंख बिखर जाते।
किसी छत की मंडेर पर थक सुप्त-सा जब बैठा होता ।
अरे, यदि मैं पंछी होता!

उनकी कविता का एक और रंग जरा देखें-
अभी न जाने दूंगी प्रियतम
अभी न जाने दूंगी!

ब्रजमारे घन ने घुमड़ घुलाया मुझको
घिर कादम्बिनी ने बरस रुलाया मुझको
दिनकरी तड़ित ने कड़क कंपाया कितना
पावस ने प्रियतम, बहुत सताया मुझको
मैं भी थिरकूंगी, थिरक-थिरक सौदामिनि-सी बिहरूंगी
अभी न जाने दूंगी प्रियतम
अभी न जाने दूंगी ।

कितनी सूक्ष्मता से विरहणी की मनोदशा का बयान शब्दों में पिरोकर कवि ने पेश कर दिया है वह निश्चित ही प्रशंसनीय है । इस संग्रह के सभी गीत, गीत में रूचि रखनेवाले पाठकों को एक दूसरे ही जहान में विहरने को विवश कर देंगे ।
प्रदीप शुक्ला

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