'जय लोक मंगल' एक सुदर्शन नायक या ख़ूबसूरत नायिका की तरह निखरता-संवरता जा रहा है । पं सुरेश नीरव की हजामत के अलावा उच्च स्तरीय रचनाओं का प्रकाशन इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है । नीरव जी की ग़ज़ल 'कई जंगल मिट चुके हैं इक शहर के वास्ते ' एक कालजयी रचना है । उन्होंने पहली बार जब यह रचना सुनायी थी तो मैं रोमांचित हो उठा था । मुनव्वर राणा साहब की ग़ज़ल भी क़ाबिले तारीफ़ है । मृगेंद्र मक़बूलसाहब पर तो हम सभी वैसे ही फ़िदा हुसैन हैं जो रोज़ाना एक पुरक़शिश ग़ज़ल पेश कर देते हैं ।
आज से अगर मैंने अपनी रचना पोस्ट करनी शुरू नहीं की तो नीरव जी मेरे सर पर डंडा बरसना शुरू कर देंगे और अभी मैं अपना सर महफूज़ रखना चाहता हूँ । इसी नाते एक रचना पेश है :
सपनों के समंदर की
असीम गहराइयों से
नापना चाहता हूँ
आकाश की अनंत ऊंचाइयां
सहेज कर रखना चाहता हूँ
इत्र की खाली शीशी में
बरसात की
पहली फुहार में भीगी
धरती की सोंधी गंध
महफूज़ रखना चाहता हूँ
आँखों के कोरों में
झुलसते मरुस्थल से
पलकों के छोरों पर
बचाकर लाई गयी
थोड़ी सी नमी
महसूस करना चाहता हूँ
अँगुलियों के पोरों से
आम के पल्लवों की पीठ पर
उग आयी
वासंती धमनियों
और शिराओं से चिपकी
मदिर सावनी पुरवैया
भींचकर रखना चाहता हूँ
वक़्त की पसीजती मुट्ठी में
गोधरा और अहमदाबाद में जली
साड़ियों की ज़री के
उलझते से तार
क़ैद रखना चाहता हूँ
तलहथियों के बीच
महाप्रलय के बाद
अंधेरों के महाविस्तार के पार
जलती बुझती
एक लरजती सी लौ
अगले महाविस्फोट के लिए !
>पुरुषोत्तम
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