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Sunday, December 13, 2009

एक सारगर्भित रचना

आज काफ़ी दिनों बाद भाई पी० एन० सिंह की एक सारगर्भित रचना देखने को मिली। मज़ा आ गया। भाई से गुज़ारिश है ब्लॉग पर ज़रा जल्दी जल्दी दर्शन दिया करैं। नीरव जी की ग़ज़ल लाजवाब ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल को पहले मोबाइल पर फिर रूबरू सुनने का मौक़ा उसी दिन मिला। ग़ज़ल सुन के तबीयत गदगदायमान हो गई। ये ग़ज़ल उन श्रेष्ठतम गजलों में शुमार होगी ऐसा मेरा मानना है। आज राजेश रेड्डी की एक और ग़ज़ल पेश है।

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं।

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ

सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।

मेरे हाथों की चाहो तो तलाशी लेलो

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं।

या खुदा, अब के ये किस रंग में आई है बहार

ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे, हरा कुछ भी नहीं।

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है, किसी बच्चे की तरह

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए, या कुछ भी नहीं।

प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

3 comments:

Unknown said...

waah !

bahut khoob !

bahut hi umda !

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढ़िया!!

Maqbool said...

bhai albelaa khatri aur paramjeet baali ji,
aap dono ka tahe-dil se shukriyaa.
maqbool