Search This Blog

Sunday, December 13, 2009

सभी लिख रहे हैं गजल धीरे-धीरे

 आज ब्लॉग पर अरविंद पथिक,अरविंद चतुर्वेदी, राजमणि,मृगेन्द्र मकबूल,पी.एन.सिंह, मधु चतुर्वेदी, कर्नल विपिन चतुर्वेदी,प्रदीप शुक्ला सभी साथियों की रचनात्मक हाजिरी देखकर मन प्रसन्न हो गया।आज मकबूलजी ने राजेश रेड्डी की बेहतरीन गजल दी है। इन शेरों का तो जवाब ही नहीं-
ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं।

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।
पुरुषोत्तमजी ने यकीनन एक सारगर्भित कविता दी है। मुझे इन पंक्तियों में कविता सीधे बातचीत करती नज़र आई है-
क़्त की पसीजती मुट्ठी में
गोधरा और अहमदाबाद में जली
साड़ियों की ज़री के
उलझते से तार
क़ैद रखना चाहता हूँ
तलहथियों के बीच
महाप्रलय के बाद
अंधेरों के महाविस्तार के पार
जलती बुझती
एक लरजती सी लौ
अगले महाविस्फोट के लिए !

राजमणिजी ने मुनव्वर राना की बेहद जिंदा गजल पढ़वाई है। इन शेरों का तो कहना ही क्या-
तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने से गुज़रना है
तुझे मैँ इस लिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ
मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी
जलाकर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ

-मुनव्वर राना साथ ही नेताजी का मोरंग का ऐतिहासिक चित्र देकर उन्हें बड़े अदब से याद किया है।
भाई अरविंद चतुर्वेदी ने तेलंगाना को लेकर अच्छी बात कही है कि-
 दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिये. यह उक्ति अब भारतीय राजनीति पर पूरी तरह खरी उतरती है. कोई भी राजनैतिक मांग तब तक ध्यान आकृष्ट नहीं करती जब तक कोई हंगामा, कोई तोड़-फोड़ न हो जाये. अलग राज्य की गठन की मांग को लेकर अनेक वर्षों से आन्दोलन चल रहा था पर सरकार के कान पर ज़ूं नहीं रेंगी. जब आन्दोलन ने हिंसक रूप लेना शुरू किया तो सरकार ने घुटने टेक दिये. लगता है अब कांग्रेस ने मन बना लिया है कि आन्ध्र प्रदेश में से तेलंगाना को पृथक राज्य के रूप में अलग किया जायेगा. इस मुद्दे पर अन्य राजनैतिक पार्टियों का रुख भी सकारात्मक है अत:देर-सबेर तेलंगाना भारतीय संघ का 29वं राज्य बन ही जायेगा. 
साथ ही ब्रज क्षेत्र को लेकर लिखा उनका व्यंग्य बहुत रोचक है-
जब तुम सबै सब कछू बांट रये हो, तुम हम ने कौन सी तुम्हाई भैन्स खोल रखी है. का हमें नायं देउगे हमाउ हिस्सा?
का कही ? हमें का चईयें ?अरे लल्ला हमें चईयें हमाऔ बृज प्रदेश।
.अरविंद पथिक ये पंक्तियां उनकी मनःस्थिति बताने के लिए काफी हैं-
अपन तो आजकल बास के खिलाफ झंडा बुलंद किए है सो ना तो कुछ लिख पा रहे हैं ,और ना सोच पा रहे हैं।अगर ज़नाब दलित ना होते तो हम भी एक्सन कर हि देते पर बकौल नीरवजी---
दांत खट्टे कर दिए अपने दलित कानून ने
जब कुछ ठोस कार्रवाई कर सकूंगा तो आप सबको तफसील बताऊंगा।
विपिनजी ने भी अपना दर्द हम ब्लॉगरों से खूब शेयर किया है- 
कुल मिलाकर ५-६ घंटे दिल्ली के polution को झेल कर और उसमें इजाफा करके वापिस आगये। न किसी से मिल पाये न नए लोगों से परिचय हुआ। न लड़कीवाले हमें जानते थे न हम उन्हें जान पाये। हाँ, उन्हें हमसे मिलने का टैक्स ज़रूर देना पढ़ा जिसे पंजाबी में "मिलनी" कहते हैं । कौन किससे मिला कोई नहीं जानता। 
भाई प्रदीप शुक्ला ने मेरी पुस्तक  ततपश्चात की समीक्षा बहुत सधे हुए ढंग से की है मैं इनकी इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा-
कितनी सूक्ष्मता से विरहणी की मनोदशा का बयान शब्दों में पिरोकर कवि ने पेश कर दिया है वह निश्चित ही प्रशंसनीय है । इस संग्रह के सभी गीत, गीत में रूचि रखनेवाले पाठकों को एक दूसरे ही जहान में विहरने को विवश कर देंगे । 
आज बस इतना ही...
पं. सुरेश नीरव 

No comments: