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Sunday, December 20, 2009

कांच की बरनी और दो कप चाय

भाई मुनीन्द्र नाथ द्वारा प्रस्तुत बोधी- कथा पढ़ कर तबीयत प्रसन्न हो गई। कथा का अंत अत्यन्त मनोहारी है। उम्मीद है शाम का वक़्त वो कभी हमारे साथ भी गुजारेंगे। शुभष्य शीघ्रम। आज आरज़ू लखनवी की एक ग़ज़ल पेश है।
ज़माना याद तेरा ऐ दिले- नाकाम आता है
टपक पड़ते हैं आंसू, जब वफ़ा का नाम आता है।

वफ़ा तुम से करेंगे, दुःख सहेंगे, नाज़ उठाएंगे
जिसे आता है दिल देना, उसे हर काम आता है।

अकेले करवटें हैं रात भर बिस्तर पे, और हम हैं
कहाँ पहलू को खाली देख कर, आराम आता है।

हसीनों में बसर कर दी जवानी आरज़ू हमने
लगाना दिल का सीखे हैं, यही इक काम आता है।
मृगेन्द्र मक़बूल

1 comment:

Udan Tashtari said...

आरज़ू लखनवी की ग़ज़ल पेश करने का आभार.