मुनीन्द्रजी तुसी ग्रेट हो
कई दिनों बाद मुनीन्द्रजी ब्लॉग पर अवतरित हुए मगर सारी कसर एक ही बोध कथा से निकाल दी। बोधकथा की अंतिम पंक्तियों में आपने संदेह अंलंकार पैदा कर दिया है।इसके लिए मैं यही कहूंगा कि वैसे ही अंधियारा काफी था तुमने और घुमाव ला दिया गलियारे में। इतनी गूढ़ कथा के अंत में शाम को दो प्याले कप के तो शायद वही रखेंगे जिन्हें यह बोध कथा पूरी तरह समझ में नहीं आई होगी बाकी लोग तो आपके उस इशारे को समझ लेंगे जिसे आप कह कर भी नहीं कह रहे हैं। और फिर क्रिसमिस और नए साल के मुबारक मौके पर खालिस चाय भला कौन पिएगा। अच्छी बोध कथा पढ़वाने के लिए शुक्रिया।
मकबूलजी आपकी ग़ज़ल धांसू है। आप आपना फोटो जल्दी भिजवाइए। जेब में चार आने तो होगे ही। इसलिए तस्वी-रे-जाना जल्दी खिंचवाएं। आप की कसरत बेनागा रहती है यह लोकमंगल के लिए फ़क्र की बात है। आपको मेरे पालागन...
पं. सुरेश नीरव

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