
हज्जामशिरोमणि पं. सुरेश नीरवजी आपने जिन प्रकाश चंदजी की हजामत बनाई है, उनकी हजामत की वैसे कोई ज़रूरत नहीं है। भगवान वैसे ही काफी मेहरबान दिख रहे हैं उन पर। फिर भी आपने जो मेहनत की है उसके लिए यही कहा जा सकता है कि अंधे को अंधेरे में बहुत दूर की सूझी। चलिए जो भी हुआ अच्छा ही हुआ और आगे भी जो होगा वह अच्छा ही होगा। कुल मिलाकर आप नए-नए लोगों से मुलाकात तो करा ही रहे हैं। मुनीन्द्रजी और मकबूलजी की रचनाएं अच्छी लगीं। प्रदीप शुक्लाजी आजकल कहां हैं।
क्या किताबें खत्म हो गईं। भाई कुछ नई किताबें इन्हें दिलवाओ।
मधु चतुर्वेदी
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