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Monday, December 21, 2009

बदन में आग सी, चेहरा गुलाब जैसा है

आज राजमणि जी द्वारा प्रस्तुत शीन काफ़ निज़ाम की लाजवाब ग़ज़ल पढ़ने को मिली। ऐसी बेहतरीन ग़ज़ल पढ़वाने के लिए शुक्रिया। आज जनाब अहमद फ़राज़ की एक ग़ज़ल पेश है।
बदन में आग सी, चेहरा गुलाब जैसा है
के ज़हरे- ग़म का नशा भी शराब जैसा है।

कहाँ वो क़र्ब के अब तो ये हाल है जैसे
तेरे फिराक़ का आलम भी ख्वाब जैसा है।

मगर कभी कोई देखे, कोई पढ़े तो सही
दिल आईना है तो चेहरा क़िताब जैसा है।

वो सामने हैं मगर तिश्नगी नहीं जाती
ये क्या सितम है के दरिया सराब जैसा है।

फ़राज़ संगे- मलामत से ज़ख्म ज़ख्म सही
हमें अज़ीज़ है, खाना- ख़राब जैसा है।
मृगेन्द्र मक़बूल

4 comments:

निर्मला कपिला said...

वाह लाजवाब धन्यवाद और बधाई

Maqbool said...

shukriya nirmala kapila ji.
maqbool

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढ़िया गजल!!

मगर कभी कोई देखे, कोई पढ़े तो सही
दिल आईना है तो चेहरा क़िताब जैसा है।

Rajeev Bharol said...

वाह क्या बात है.
फराज़ साहब का कलाम जब भी पढ़ो अच्छा लगता है.