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Thursday, December 17, 2009

अब कलम हो खुदा, सुर्ख़ रौशनाई न दे।


चराग़ अपने थकन की कोई सफाई न दे
वो तीरगी है के अब ख्वाब भी दिखाई न दे।

बहुत सताते हैं, रिश्ते जो टूट जाते हैं
खुदा किसी को भी तौफीके- आशनाई न दे।

मैं सारी उम्र अंधेरों में काट सकता हूँ
मेरे दीयों को मगर रौशनी पराई न दे।

अगर यही तेरी दुनिया का हाल है मालिक
तो मेरी क़ैद भली है, मुझे रिहाई न दे।

दुआ ये मांगी है, सहमे हुए मुआर्रिक ने
के अब कलम हो खुदा, सुर्ख़ रौशनाई न दे।
मेराज फैज़ाबादी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

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