रोज की तरह आज भी अखबार ऊठाया तो सहसा एक समाचार पर निगाह ठिठक गयी।७१ की विजयगाथा के एक नायक ब्रिगेडियर कौल का इंटरव्यु छपा था जिसमे बांगलादेश के निर्माण के परिद्रश्य और उस युद्ध के नायकों के शौर्य तथा बलिदान को विस्मृत कर देने ,एक युद्द स्मारक तक न बनाने के दर्द को बयां किया गया था।एकाएक मुझे याद आया कुछ बरस पहले दिल्ली सरकार वीर रस कवि सम्मेलन किया करती थी पर कांगरेस सरकार आने के साथ ही मानो वीरता और पराकृम की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी,ऐसा मानकर दस जनपथ के पालतू बुलडाग जनार्दन द्विवेदी ने अकादमी का सचिव बन सबसे पहले वीर रस कवि सम्मेलन का ही आखेट किया।विचारों के क्रम मे ही द्यान आया कि आज तो अमर शहीद अशफाक उल्ला खां का बलिदान दिवस है।शायद किसी अखबार में कुछ छपा हो सोचते हुए स्कूल लाइब्रेरी में कम से कम दस अखबार छान मारे पर कोपनहेगन मे उल्झे हमारे नेताओं पत्रकारों को फुरसत ही कहां है जो देश अपना सब कुछ लुटा देने वाले शहीद को याद कर सकें।जीवन की आपाधापी ने कम से कम लोकमंगल परिवार को इतना क्रतघ्न नही बनाया है कि ऊसके सदस्य अशफाक उल्ला खां को भुल जायें इस बात को रेखांकित करते हुए मैं अमर शहीद अशफाक उल्ला खां के चंद अशआर जो उन्होने फांसी--- बाली रात को कहे थे पेश कर रहा हूं----
अफसोस़, क्यों नहीं वह रुह अब वतन में?
जिस ने हिला दिया था दुनिया को एक पल में
ऐ पुख्ताकार-उल्फत हुशियार डिग नजाना,
मराज आशकां हैं इस दार और रसन में
मौत और ज़िंदगी है दुनियां का सब तमाशा,
फरमान कृष्ण का था ,अर्जुन को बीच रन में
कुछ आरजू नही है,है आरज़ू तो यह है,
रख दे कोई ज़रा सी खाके वतन कफन में
सैयाद ज़ुल्म पेशा आया हे जब से हसरत
हैं बुलबुलें कफस मे ज़ागोज़गन चमन में।
बुज़दिलों को ही सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हे रोज़ ही मरते देखा
मौत से वीर को हमने नही डरते देखा
तख्तये मौत पै भी खेल ही करते देखा
मौत एक बार जब आना है तो डरना क्या है?
अम सदा खेल ही समझा किये,मरना क्या है?
वतन हमेशा रहे शाद काम और आज़ाद
हमारा क्या है,अगर हम रहे, रहे न रहे।
१७ दिसंबर १९२७ को फैज़ाबाद जेल मे भारतमाता पर न्योछावर होने से पहले उस महान देशभक्त ने कहा था------
तंग आकर हम भी उनके ज़ुल्म से बेदाद से
चल दिए सुए अदम ज़िन्दाने फैज़ाबाद से
शाहज़हांपुर की धरती पर जन्मे उस महान देशभ्क्त को उसकी ही सरज़मी पर जन्मे इस नाचीज़ का कोटि कोटि प्रणाम .
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