
आजकल नीरवजी के सेलून में राष्ट्रीय प्रसारण के ग्राहक ज्यादा आ रहे हैं,क्या बात है। लगता है कि उन्हें नीरवजी के हुनर की तारीफ कई जगह से सुनने को मिल गई होगी। पहले डॉ. रवीन्द्र त्यागी जी आए और फिर प्रकाश चंद जी। दोनों की ही हजामत बड़े सलीके से बनाई गई है। इतने ज्यादा सलीके से कि मुझे तो खुद अपनी हजामत बनवाने की इच्छा होने लगी है। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी आज नहीं तो कल उस्तरा मेरी गर्दन पर भी चल ही जाएगा। जब तक नहीं चल रहा है तब तक दूसरों की हजामत बनते देखने का भी तो एक सुख होता है मैं फिलवक्त उसी का लुत्फ उठा रहा हूं। मुनीन्द्रजी की बोध कथा और मकबूल जी हस्बमामूल उम्दा ही रहे और आगे भी उम्दा ही रहें,मेरी यही मंगल कामनाएं हैं। जय लोक मंगल...
अरविंद पथिक
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