कल कुछ व्यस्तताओं की वजह से ब्लॉग नहीं देख पाया। आज ब्लॉग देखा तो तबीयत हरी हो गई। नीरव जी तो कहर ढा रहे हैं। लाजवाब ग़ज़ल के लिए उनका अभिनन्दन करता हूँ। आज वेदना उपाध्याय की पहली सारगर्भित रचना अच्छी लगी। इसी तरह ब्लॉग पर नज़र आती रहें तो और अच्छा लगेगा। आज अनिल जी ने भी सुंदर रचना प्रस्तुत की है। उन्हें भी साधुवाद। आज रोशन नंदा की एक ग़ज़ल पेश करता हूँ। मुलाहिजा हो।
बाद मुद्दत उन्हें देख कर यूँ लगा
जैसे बेताब दिल को क़रार आ गया।
आरजूओं के गुल मुस्कराने लगे
जैसे गुलशन में जाने- बहार आ गया।
तश्ना नज़रें मिलीं, शोख नज़रों से जब
मय बरसने लगी, जाम भरने लगे
साक़ीया आज तेरी ज़रूरत नहीं
बिन पिए, बिन पिलाए, ख़ुमार आ गया।
रात सोने लगी, सुब्ह होने लगी
शम्मा बुझने लगी, दिल मचलने लगे
वक़्त की रौशनी में नहाई हुई
ज़िन्दगी पे अजब सा निखार आ गया।
हर तरफ मस्तियाँ, हर तरफ दिलकशी
मुस्कराते दिलों में खुशी ही खुशी
कितना चाहा, मगर फिर भी उठ ना सका
तेरी महफिल जो एक बार आ गया।
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
5 comments:
लाजवाब गज़ल बधाई
जगजीत की आवाज में इस गज़ल को सुना है । अद्भुत प्रभाव देती है ।
प्रस्तुति का आभार ।
nirmala kapila ji aur himnshu kumar pandey ji. gazal aapko pasand aai. shukriyaa.
maqbool
कितना चाहा, मगर फिर भी उठ ना सका
तेरी महफिल जो एक बार आ गया।
वाह लाजवाब...शुक्रिया आपका इस ग़ज़ल को हम तक पहुँचाने के लिए...
नीरज
neeraj goswami ji, aapkaa bhi gazal pasand karne ke lie tahe- dil se shukriyaa.
maqbool
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