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Saturday, December 19, 2009

गरीबों के पेट से अलाव निकलते देखे है

हालात की कोख से पाप निकलते देखे हैं
हमने आस्तीनों से सांप निकलते देखे हैं
अमीरों की प्लेट में देखी है भरपेट जूठन
गरीबों के पेट से अलाव निकलते देखे है
टूटे देखे है अरमान भी मुफलिसों के
बहती आँखों से ख्वाब निकलते देखे है
ताब देखे है हर शाम तेरी महफ़िल में
और तेरी महफ़िल से बेताब निकलते देखे हैं
जवाब देखे हैं लाखों हर एक सवाल के
पर कुछ सवाल भी लाजवाब निकलते देखे हैं
हाथ भी देखे हैं काले काजल की कोठरी में
और कोयले से आफताब निकलते देखे हैं
अनिल (१९.१२.२००९ ६.०० बजे सायं )

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