हालात की कोख से पाप निकलते देखे हैं
हमने आस्तीनों से सांप निकलते देखे हैं
अमीरों की प्लेट में देखी है भरपेट जूठन
गरीबों के पेट से अलाव निकलते देखे है
टूटे देखे है अरमान भी मुफलिसों के
बहती आँखों से ख्वाब निकलते देखे है
ताब देखे है हर शाम तेरी महफ़िल में
और तेरी महफ़िल से बेताब निकलते देखे हैं
जवाब देखे हैं लाखों हर एक सवाल के
पर कुछ सवाल भी लाजवाब निकलते देखे हैं
हाथ भी देखे हैं काले काजल की कोठरी में
और कोयले से आफताब निकलते देखे हैं
अनिल (१९.१२.२००९ ६.०० बजे सायं )
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