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Saturday, December 19, 2009

मेरी पोल खोल दी मनीप्ल़ंट ने



इनसे मिलिए
(डॉ. रवीन्द्र कुमार त्यागी)

कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनको देखकर यह अंदाज़ा लगाना बड़ा कठिन होता है कि ये कितनी गहराई रखते होंगे। ऐसी गहराई के बड़े जोखिम होते हैं। लोग मज़ाक-ही-मज़ाक में इधर उतरे और उधर रपटे। गई भैंस पानी में। कुछ ऐसी ही भ्रमोत्पादक गहराई से लवरेज़ हैं-डॉ. रवीन्द्र कुमार त्यागी। हाथी डुब्बा गहराई है इन में। मैं इन्हें एक लंबे अर्से से देखता रहा हूं। और मुझे रोक भी कौन सकता है। मैं अच्छे-अच्छों को देखता रहा हूं। मगर इन्हें देखा तो देखता ही चला गया। विश्वस्त सूत्रों से इनके बेकग्राअंड को खंगाला तो पता चला कि भाई साहब इस मृत्युलोक में बाया बाड्ढा वाजिदपुर बुलंदशहर 15 फरवरी1962 को तशरीफ लाए थे और तबसे  बाकायदा यहीं आबाद हैं,जिंदाबाद हैं। खानदान पूरी किसानी ठसकवाला रहा है। उत्तमखेती मध्यमान अधम चाकरी भीख निदान के दर्शन को मानवाले पिताजी जंगवीर सिंह त्यागी ने कुछ दिन नौकरी की और 1942 में जब गांधीजी सबसे नौकरी छोड़ने का अह्वान कर रहे थे  तो वो स्वेच्छा से और कुछ पारिवारिक परिस्थियों के कारण अपने ही आप नौकरी छोड़ कर गांव आ गए। और फिर नौकरी की तरफ कभी रुख  नहीं किया।  िपताजी ने बल थामा तो  बेटे रवीन्द्र ने क़लम थाम ली और धड़धड़ाते हुए जे. एन.यू. से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की  डिग्री और फिर मानवआधिकार और राष्ट्रसंध  विषय पर पीएच.डी. कमा ली। यह कारनामा इन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के तहत प्राप्त किया। उसके जन्मपत्री के सितारों ने पलटा खाया और जनाब धरती से आकाश नापने आकाशवाणी की ओर मुखातिब हो गए। आकाशवाणी के घाट-घाट का पानी पीकर रवीन्द्र बाबू आजकल  आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण में इतनी मजबूती से तैनात हैं कि अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहे। बड़े स्थिर लग्न में आए थे यहां। साथी कहीं के कहीं पहुंच गए भाई साहब कोई लुढ़कने पत्थर थोड़े ही हैं। हिमालय हैं जहां थे वहीं रखे हुए हैं। और यहीं रहेंगे। इनका आचरण मुझे काफी संदिग्ध लगा,मुझे लगा कि कि कहीं कुछ गड़बड़ है काफी तफ्तीश करी तो पता लगा कि भाई साहब भूमिगत कवि भी हैं। एक दिन अचानक औचक छापा मारा तो एक पुरात्त्व महत्व की एक बेशकीमती कविता बरामद हुई,जिसकी कार्बनिक एज निकालने पर पता चता कि वह कोई 15 साल पुरानी है और इसे बाकायदा एंटीक का दर्जा दिया जा सकता है। कविता का शीर्षक है-मनीप्लॉंट..वैसे कविराज रवीन्द्र नाथ टैगोर के ये उतने ही घनिष्ट रिश्तेदार हैं जितना कि मैं हूं। इसलिए कविता करना इनका भी संवैधानिक अधिकार है और अच्छी कविता लिखना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है। चलिए मैं आप सभी को उस ऐतिहासिक कविता से रू-ब-रू कराता हूं-
 मैंने घर में लगाया है एक मनीप्लॉंट
असके पत्ते की हरियाली देखकर मैं ख़ुश होता हूं
रोज़ उसे ख़ूब पानी देता हूं
हर रोज़ सुबह-शाम
इसकी हरी पत्तियां मुझे जीवन की
जीवंतता का अनुभव कराती हैं
परंतु माह की 20 तारीख के ासपासमें
मेरे मनीप्लॉंट की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं
मेरा पानी  देना या देखभाल करना
कोई असर नहीं करता
मैं परेशान हो उठता हूं
मगर 30 ताऱीख का इंतज़र करने के अलावा
कोई चारा भी तो नहीं रहता
कहते हैं कि मनीप्लांट वहीं
  हरे-भरे रहते हैं जहां समॉद्धि हो
अलबत्ता ये 20 तारीख से ही
आनेवालों के सामने
मेरी स्थिति का राज़ खोलने लगते हैं...
अगर आपको भी इनके चुरलखोर मनीप्लॉंट से मिलना हो तो आप इनसे यहां धड़ल्ले से धावा बोल सकते हैं,मैं इनका पता आपको भी दिए दे रहा हूं-
8-3 प्लैट-जी-3 आरुषी अपार्टमेंट,सेक्टर-3,राजेन्द्र नगर,साहिबाबाद
मोबाइल-9868129048
पं. सुरेश नीरव

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