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Friday, December 11, 2009

अपना भी बजाने का मन

आज लोकमंगल पर खासी रौनक है भाई अरूण त्रिपाठी की शारदा पाटक को भावांजलि भावपूर्ण व ग्यानवरद्धक है।पी एन सिंह की हजामत बेहतरीन है।उनकी पीपियों मै से कोई उपलब्ध हो अपना भी बजाने का मन हो क्या अच्छा हो अगर सिंह साहब दरियादिली दिखाते हुइ कुछ पींपियां लोकमंगल हेतु अर्पित कर दें।नाई को बैंडमास्टर बना देख आशंका हुई कि ना जाने किस गरीब का बैंड बज रहा या बजने वाला है खुदा खैर करे।कुल मिलाकर जोरदार प्रस्तुति ।हरेप्रकाश की घडी कविता के बाद इस नयि कविता ने उन्हे सीरियसली लेने पर मज़बुर किया है।निश्चित रुप से ये चाक-चौबंद कवि देश काल के लिए सहेजे जाने लायक है,अच्छी कविता के लिए बधाई।
अपन तो आजकल बास के खिलाफ झंडा बुलंद किए है सो ना तो कुछ लिख पा रहे हैं ,और ना सोच पा रहे हैं।अगर ज़नाब दलित ना होते तो हम भी एक्सन कर हि देते पर बकौल नीरवजी---
दांत खट्टे कर दिए अपने दलित कानून ने
जब कुछ ठोस कार्रवाई कर सकूंगा तो आप सबको तफसील बताऊंगा।

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