अभी ब्लॉग खोला तो अरुण त्रिपाठीजी का शारदा पाठक पर बड़ा मार्मिक लेख पढ़ने को मिला। सच आज ऐसे पत्रकार कहां रह गए हैं जो अपने उसूलों के लिए ज़िंदगी दांव पर लगा दें। और ैसे भी कितने पत्रकार हैं जो ऐसे लोगों को याद करें।मेरी बधाई स्वीकारें।,त्रिपाठीजी।
डॉ.मधु चतुर्वेदी
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