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Tuesday, December 22, 2009

छाया है नूर तेरा जित देखती नज़र है


छाया है नूर तेरा जित देखती नज़र है
कैसे बयाँ करूँ मैं कोई शब्द ही नहीं हैं
प्रात की पौ जो फूटी स्वर्णिम हुई दिशाएं
   सर- सर समीर चलती औ कलियाँ मुस्कराएँ
   मखमल बिछी ज़मीन पर हीरे सी चमचमाए
   पक्षी उड़े गगन में चिंता उन्हें नहीं है
   कैसे बयाँ ------
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छाई छटा दुपहर की सूरज जो चढ़ गया है
   धरती की पर्त अब तो अग्नि सी तप रही है
   भीषण चली है आँधी औ धूल उड़ रही है
    हुआ त्रस्त है बटोही छाया कहीं नहीं है
    कैसे बयाँ -----
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आई गोधुलि बेला वही सूर्य ढल रहा है
   जंगल में ग्वाला कोई बंशी बजा रहा है
    बिखरे हुए ढो रों को गाकर बुला रहा है
    माँ -माँ पुकारे बछड़ा अभी आई वो नहीं है
    कैसे बयाँ -----
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दिन ढल गया है जलता शीतल है सांझ आई
   गुल सो गये हैं दिन के है रात- रानी छाई  
   उसकी सुगंध लेने धरती पे परियाँ आई
   दिल दीप जगमगाए अंधेरा कहीं नहीं है
   कैसे बयाँ ----
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 है चाँद नभ  में उतरा तारे बाराती लेकर
     लहरें हैं करती स्वागत आरती को हाथ लेकर
    चिमगादड़ो की निकली टोली है शशि दरस को
     हर्षित चकोर भी है उसको व्यथा नहीं है
     कैसे बयाँ ------
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  सागर किनारे बैठा प्रेमी ,कवि है पागल
     लहरों को चूमता है चंदा को घूरता है
     कभी मुस्करा वो उठता कभी नैन भर के आते
      कभी गीत गाके झूमे अभी शब्द भी नही हैं
     कैसे बयाँ---
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तेरा नूर चाँद में है तेरा नूर है सूरज में
    तेरा नूर वह रहा है चलती हुई पवन में
कर -कर निनाद नदियाँ तेरा नूर गा रही हैं
      बनके लहर समाया तेरा नूर ही सागर में
      नहीं कोई भी जगह है तेरा नूर जहाँ नहीं है।
वेदना उपाध्याय
शाहजहांपुर


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