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Tuesday, December 22, 2009

ज़हरे- ग़म का नशा भी शराब जैसा है।


मकबूलजी
आपने जो ग़ज़ल पढ़वाई है वह बहुत ही पाएदार ग़ज़ल है और इन शेरों का तो मैं तहेदिल से मुरीद हो गया हूं-
बदन में आग सी, चेहरा गुलाब जैसा है
के ज़हरे- ग़म का नशा भी शराब जैसा है।

कहाँ वो क़र्ब के अब तो ये हाल है जैसे
तेरे फिराक़ का आलम भी ख्वाब जैसा है।

पं. सुरेश नीरवजी,
मधु वाता ऋतायते

यहां हवाओं में मधु है,सांसों में मधु है,वाणी में मधु है सर्वत्र मधु ही मधु है-मधु वाता ऋतायते॥ मेरे भी चारों तरफ मधु ही मधु हैं ऋग्वेद मुझ पर ही तो सार्थक हुआ है, आपका जवाब नहीं है।
शीन काफ़ निजाम के इन शेरों पर तो मैं मर-मर जाऊं- राजमणिजी आपका शुक्रिया-ही शुक्रिया
हम मुन्तज़िर थे शाम से सूरज के, दोस्तो!
लेकिन वो आया सर पे तो क़द अपना घट गया

गाँवों को छोड़ कर तो चले आए शहर में
जाएँ किधर कि शहर से भी जी उचट गया

आज बेहद मजे में हूं मैं। आप सभी को बधाई...
ओ. चांडाल

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