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Monday, December 21, 2009


कौन कहता है कि निर्जीव में संवेदनाएं नहीं होती। अभी हाल की वैज्ञानिक खोजों ने सिद्ध किया है कि शरीर में बाल और नाखून निर्जीव होते हैं। इन्हें काटने पर खून नहीं निकलताय़हां तक तो बात समझ में आती है मगर नाखून और बालों में संवेदनाएं नहीं होती यह बात समझ से परे लगती है। क्रोध को क्षणों में बालों का खड़ा होना भय में रोंगटे खड़ै हो जाना और क्रोध में बाल पकड़ कर खींचना या फिर अपने ही बालों को नोंचना क्या निर्जीव और संवेदनाहीन होने के लक्षण तो नहीं कहे जा सकते। ऐसे ही नाखूनों में दर्द होना, नाखूनों में पपड़ियां और धारी पड़ जाना और र्क्ताल्पता में नाखूनों का सफेद हो जाना संवेदनाहीनता के लक्षण तो कतई नहीं है। शायद यह निष्कर्ष इस बात के आधार पर निकाला हो कि मृत्यु के बाद भी नाखून और बाल बढ़ते रहते हैं तो इतने से आधार पर उनका संवेदनाहीन होना तो तय नहीं हो पाता। खैर आज ही समाचार पढ़ा तो मन में यह प्रतिक्रया हुई,लोकमंगल के साथियों से शेयर करना चाहूंगी।
मुनीन्द्रजी की बोध कथा और मकबूलजी की ग़ज़ल अच्छी लगी। नीरवजी की हजामत कार्रवाई काबिले ताऱीफ है। सभी साथियों को जय लोक मंगल...
मधु

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