एक गीत लोकमंगल के साथियों के लिए सादर प्रस्तुत कर रही हूं। आशा है साथियों को पसंद आएगा।
१,ये मानव का जीवन है पशु का न
तू मानव की संतान है शक्तिशाली
ज़रा खोल मुट्ठी कदम को बढ़ा
धरो आज धीरज--------
२ ,मिली है सफलता उन्हीं को जगत
क्या देखा नहीं तुमने माखी क
नहीं मधु है मिलता किसी को
धरो आज धीरज-----
३,क्या देखा नहीं तुमने पृथ्वी
कभी वह है जलती ,कभी भीगती ह
पर है धैर्य इतना शिकायत ना क
धरो आज धीरज -----
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४देखो ज़रा उन वृक्षों को मुड़
कभी आँधी आती,कभी वर्षा आती ,
हो जितनी मुसिवत मगर वे अड़े ह ैं ,मिले तुमको भी शक्ति सादीक् षा यही है
धरो आज धीरज ------------
धरो आज धीरज ------------
५,जो बढ़ते सफ़र में ठिठकता नही
अटल जो हिमालय के जैसे खड़ा
उसी के विजय श्री कदम चूमती ह
धरो आज धीरज चलो शांत होकर ,न भ
वेदना उपाध्याय
शाहजहांपुर
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