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Monday, December 14, 2009

ना भटको डगर से सादीक्षा यही है

एक गीत लोकमंगल के साथियों के लिए सादर प्रस्तुत कर रही हूं। आशा है साथियों को पसंद आएगा।

धरो आज धीरज चलो शांत होकर, ना भटको डगर से सादीक्षा यही है 
,ये  मानव का जीवन है पशु का हीं है ,बिताओ ना इसको यूँ आलस्यरत हो 
    तू मानव की संतान है शक्तिशाली ,है शक्ति छुपी तेरी मुट्ठी के अंदर 
   ज़रा खोल मुट्ठी कदम को बढ़ा तू ,कदम चूमे सागर सादीक्षा यह है 
धरो आज धीरज--------

 ,मिली है सफलता उन्हीं को जगत में ,जो बढ़ते चले थे निरंतर  आगे 
   क्या देखा नहीं तुमने माखी  जीवन ,मधु के लिए कितना संघर् करती 
    नहीं मधु है मिलता किसी को सहज में ,तुम्हें भी मिले मधु ादीक्षा यही है 
धरो आज धीरज-----

,क्या देखा नहीं तुमने पृथ्वी का संघर्ष ,आते हैं इसपे ही मौसम अनेकों 
  कभी वह है जलती ,कभी भीगती   ,कभी कापती  है वह पाले में ड़कर 
  पर है धैर्य इतना शिकायत ना रती ,मिले तुमको भी धीरज सादीक्षा यही है 
धरो आज धीरज -----
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देखो ज़रा उन वृक्षों को मुड़कर ,कितनी शांति से अपनी जगह पर खड़े हैं 
  कभी आँधी आती,कभी वर्षा आती ,कभी ग्रीष्म जलता शिशिर कापता 
 हो जितनी मुसिवत मगर वे अड़े ैं ,मिले तुमको भी शक्ति सादीक्षा यही है 
धरो आज धीरज ------------

,जो बढ़ते सफ़र में ठिठकता नही है ,मुसिवत के आगे जो झुकता हीं है 
   अटल जो हिमालय के जैसे खड़ा है ,जो सागर के जैसे निरंतर सक्रिय है 
  उसी के विजय श्री कदम चूमती  ,हर विजय तुमको चूमें सादीक्षा यही है 
धरो आज धीरज चलो शांत होकर , टको डगर से सादीक्षा यही है ||
 
वेदना उपाध्याय
शाहजहांपुर

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