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Monday, December 14, 2009

ख्वाहिशों ख़्वाबों के घर में तुम बहुत महफूज़ हो


ग़ज़ल
कोई भी रस्ता मिले ना तब उसे तुम सोचना
रोशनी  की  रूह  से ख़ुद रास्ते  बन जाएंगे

चाहिए  बस  एक  पत्थर  बुत बनाने के लिए
पूजते  ही  बस  मेरे  वो  देवता  बन जाएंगे

बेशऊरों   से मिलो  तो  फासला  रखना ज़रूर
हंस  के दो बातें कहीं तो सर पे ये चढ़ जाएंगे

ख्वाहिशों ख़्वाबों के घर में तुम बहुत महफूज़ हो
जो  जमीं पर  पांव रक्खा तो बदन जल जाएंगे

हर   मुकम्मिल आदमी  को अब हराया जाएगा
और  ये  आधे-अधूरे  सब  यहां  चल  जाएंगे

गीली  मिट्टी  का  कोई  चेहरा  कभी होता नहीं
जैसै  ढालोगे  ये  बच्चे  वैसे  ही  ढल  जाएंगे।

पं. सुरेश नीरव
( आज ही कही है यह ग़ज़ल)

2 comments:

सदा said...

गीली मिट्टी का कोई चेहरा कभी होता नहीं
जैसै ढालोगे ये बच्चे वैसे ही ढल जाएंगे।

बहुत ही बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

शारदा अरोरा said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल , खास कर ये
चाहिए बस एक पत्थर बुत बनाने के लिए
पूजते ही बस मेरे वो देवता बन जाएंगे
ख्वाहिशों ख़्वाबों के घर में तुम बहुत महफूज़ हो
जो जमीं पर पांव रक्खा तो बदन जल जाएंगे