ग़ज़ल
कोई भी रस्ता मिले ना तब उसे तुम सोचना
रोशनी की रूह से ख़ुद रास्ते बन जाएंगे
चाहिए बस एक पत्थर बुत बनाने के लिए
पूजते ही बस मेरे वो देवता बन जाएंगे
बेशऊरों से मिलो तो फासला रखना ज़रूर
हंस के दो बातें कहीं तो सर पे ये चढ़ जाएंगे
ख्वाहिशों ख़्वाबों के घर में तुम बहुत महफूज़ हो
जो जमीं पर पांव रक्खा तो बदन जल जाएंगे
हर मुकम्मिल आदमी को अब हराया जाएगा
और ये आधे-अधूरे सब यहां चल जाएंगे
गीली मिट्टी का कोई चेहरा कभी होता नहीं
जैसै ढालोगे ये बच्चे वैसे ही ढल जाएंगे।
पं. सुरेश नीरव
( आज ही कही है यह ग़ज़ल)

2 comments:
गीली मिट्टी का कोई चेहरा कभी होता नहीं
जैसै ढालोगे ये बच्चे वैसे ही ढल जाएंगे।
बहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति ।
बहुत सुंदर ग़ज़ल , खास कर ये
चाहिए बस एक पत्थर बुत बनाने के लिए
पूजते ही बस मेरे वो देवता बन जाएंगे
ख्वाहिशों ख़्वाबों के घर में तुम बहुत महफूज़ हो
जो जमीं पर पांव रक्खा तो बदन जल जाएंगे
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