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Wednesday, December 16, 2009

ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए

आज एक ग़ज़ल प्रस्तुत करता हूँ जो कभी किसी मुशायरे में सुनी थी। ग़ज़ल चूंकि मुझे अच्छी लगी लिहाज़ा डायरी में दर्ज़ करली, मगर शायर का नाम नहीं लिख पाया। बहरहाल ग़ज़ल पेश है।
ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए।

दिल को अपने सज़ा न दे यूँ ही
इस ज़माने की बेरुख़ी के लिए।

कल जवानी का हश्र क्या होगा
सोच ले आज दो घड़ी के लिए।

हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए।

वक़्त के साथ साथ चलता रहे
यही बेहतर है आदमी के लिए।
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

2 comments:

mehek said...

हर कोई प्यार ढूंढता है यहाँ
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए।

वक़्त के साथ साथ चलता रहे
यही बेहतर है आदमी के लिए।
wah bahut khub,ye sher bahut pasand aaye

निर्मला कपिला said...

ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए।

वक़्त के साथ साथ चलता रहे
यही बेहतर है आदमी के लिए। लाजवाब गज़ल । धन्यवाद्