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Monday, February 22, 2010

भीड़-भाड़ में चलना क्या?

मकबूलजी आपको वीरेन्द्र मिश्र की कविता ने पुरानी यादे ताज़ा कर दी होंगी। आज पेश है प्रसिद्ध जनवादी कवि मुकुट बिहारी सरोज की कविता

भीड़-भाड़ में चलना क्या?
कुछ हटके-हटके चलो

वह भी क्या प्रस्थान कि जिसकी अपनी जगह न हो
हो न ज़रूरत, बेहद जिसकी, कोई वजह न हो,
एक-दूसरे को धकेलते, चले भीड़ में से-
बेहतर था, वे लोग निकलते नहीं नीड़ में से

दूर चलो तो चलो
भले कुछ भटके-भटके चलो

तुमको क्या लेना-देना ऐसे जनमत से है
खतरा जिसको रोज, स्वयं के ही बहुमत से है
जिसके पांव पराये हैं जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं

भले नहीं सुविधा से -
चाहे, अटके-अटके चलो

जिनका अपने संचालन में अपना हाथ न हो
जनम-जनम रह जायें अकेले, उनका साथ न हो
समुदायों में झुण्डों में, जो लोग नहीं घूमे
मैंने ऐसा सुना है कि उनके पांव गये चूमे

समय, संजोए नहीं आंख में,
खटके, खटके चलो.
मुकुट बिहारी सरोज


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