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Thursday, February 11, 2010

जिसे बुझा के हवा सोगवार फिरती थी ...

कहाँ था इतना अजब आशना मेरा चेहरा
जले चिराग तो बुझने लगा मेरा चेहरा

वो तेरे हिज्र के दिन वो सफ़र सदियों के
तू उन दिनों में कभी देखता मेरा चेहरा

जुदाइयों के सफ़र में रहे हम साथ सदा
तेरी तलाश ज़माने हवा मेरा चेहरा

मेरे सिवा कोई इतना उदास भी तो न था
खिज़ा के चाँद को अच्छा लगा मेरा चेहरा

किताब खोल रहा था वो अपने माजी की
वर्क -वर्क पे बिखरता गया मेरा चेहरा

सहर के नूर से धुलती हुई तेरी आंखें
सफ़र की गर्द में लिपटा हुआ मेरा चेहरा

हवा का आखिरी बोसा था या क़यामत थी
बदन की शाख से फिर गिर पड़ा मेरा चेहरा

जिसे बुझा के हवा सोगवार फिरती थी
वो शमा-ए-शाम-ए-सफ़र थी कि मेरा चेहरा

ये लोग क्यों मुझे पहचानते नहीं मोहसिन
मैं सोचता हूँ कहाँ रह गया मेरा चेहरा

प्रस्तुति: अनिल (११.०२.२०१० सायं ४.१५ बजे )

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