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Friday, February 12, 2010

काँटों से गुज़र जाना, शोलों से निकल जाना

काँटों से गुज़र जाना, शोलों से निकल जाना
फूलों की बस्ती में, जाना तो संभल जाना।

दिन अपने चराग़ों के मानिंद गुज़रते हैं
हर सुबह को बुझ जाना, हर शाम को जल जाना।

बच्चों ही सी फ़ितरत है, हम अहले- मुहब्बत की
ज़िद करना, मचल जाना, फिर ख़ुद ही संभल जाना।

वो शख्श भला मेरा क्या साथ निभाएगा
मौसम की तरह जिसने, सीखा है बदल जाना।
साग़र आज़मी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

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