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Sunday, February 14, 2010

...पत्थर भी पिघल जाते हैं


तुझ से मिलने को कभी जो हम मचल जाते हैं

तो ख्यालों में बहुत दूर निकल जाते हैं

अगर वफाओं में सदाक़त भी हो शिद्दत भी हो

फिर तो एहसास से पत्थर भी पिघल जाते हैं

उसकी आँखों के नशे में हूँ जब से डूबा

लडखडाते हैं कदम और संभल जाते हैं

बेवफाई का मुझे जब भी ख्याल आता है

अश्क बेसाख्ता आँखों से फिसल जाते हैं

प्यार में एक ही मौसम है बहारों का

लोग मौसम की तरह कैसे बदल जात्ते हैं

प्रस्तुति: अनिल (१५.०२.२०१० पूर्वाहन ११.४५ बजे )

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