मित्रो, फागुन का महीना शुरू होते ही फिज़ा रंगीन नज़र आने लगी है। होली की मस्ती ज़हन पे छाने लगी है। इसी मौसम का एहतराम करते हुए पिछली होली पे कही एक ग़ज़ल पेश है।
दुनिया रंगीली लग रही होली के रंग में
कल्लो कटीली लग रही होली के रंग में।
अब भंग की तरंग का कुछ ऐसा रंग है
हर शै नशीली लग रही होली के रंग में।
जीजा शिरी फुदक रहे साली के संग में
छमियां छबीली लग रही होली के रंग में।
ये भंग की तरंग है या जाम का नशा
बुढ़िया नवेली लग रही होली के रंग में।
इस फाग की मस्ती में सभी टुल्ल हो गए
मिर्ची रसीली लग रही होली के रंग में।
मक़बूल इन रंगों की क़यामत तो देखिये
कैसी सजीली लग रही होली रंग में।
मृगेन्द्र मक़बूल
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