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Monday, February 22, 2010

जगनिक की आल्हा

आज वीरेन्द्र मिश्रजी की रचना और अदम गौंडवी साहब की कविता ने बहुत सुकून दिया। और-तो-और आज मधु मिश्रा भी हाजिर हैं यह देखकर बहुत ही अच्छा लगा। मकबूलजी और अनिलजी ने बेहद बढ़िया रचनाएं दीं हैं और वेदना उपाध्याय की लंबी कविता भी बहुत अच्छी लगी। अनिलजी ये शेर बहुत अच्छा है-
ये नर्म लहजा, ये रंगीनी-ए-बयान, ये खुलूस

मगर लड़ाई तो ऐसे लड़ी नहीं जाती

मधु मिश्राजी अदम साहब की इन पंक्तियों के क्या कहने-

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

मकबूलजी
सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफिर ने जाने कहाँ रात की।

मुक़द्दर मेरे चश्मे- पुरआब का
बरसती हुई रात बरसात की।
आपके ये शेर बहुत ही जहनियत के शेर हैं। बधाई स्वीकारें।
आज में प्रस्तुत कर रही हूं वीर रस के सिद्ध कवि जगनिक की जगत प्रसिद्ध आल्हा

युध्द-वर्णन

खट-खट-खट-खट तेगा बाजै। बोलै छपक-छपक तलवार।
चलै जुनब्बी औ गुजराती। ऊना चलै बिलायत क्यार॥
तेगा चटकैं बर्दवान के। कटि-कटि गिरैं सुघरुआ ज्वान।
पैदल के संग पैदल अभिरे। औ असवारन ते असवार॥
हौदा के संग हौदा मिलिगै। ऊपर पेशकब्ज की मार॥
कटि-कटि शीश गिरै धरनी में। उठि-उठि रूंड करै तलवार।
आठ कोस के तहँ गिरदा में। अंधाधुंध चलै तलवार।
पैग-पैग पर पैदल गिरिगे। उनके दुइ-दुइ पग असवार।
बिसे बिसे पर हाथी डोरे। छोटे पर्वत की उनहार।
कल्ला कटिगै जिन घोडन के। धरती गिरे भरहरा खाय॥
कटे भुसुंडा जिन हाथिन के। दल में गिरैं करौटा खाय।
कटि भुजदंडै रजपूतन की। चेहरा कटि सिपाहिन क्यार॥
दोनों सेना एकमिल हो गईं। ना तिल परै धरनि में जाय।
ज्यों सावन में छूटै फुहारा। त्यों है चलै रक्त की धार॥

परे दुशाला जो लो में जनु नद्दी में परो सिवार।
पगिया डारी जे लोहु में। मानो ताल फूल उतरायँ॥
परी शिरोही हैं ज्वानन की। मानो नाग रहे मन्नाय।
घैहा डारे रण में लोटैं। जिनके प्यास-प्यास रट लागि॥
मुर्चन-मुर्चन नचै बेंदुला। ऊदनि कहै पुकारि-पुकारि॥
नौकर चाकर तुम नाहीं हौ। तुम सब भैया लगौ हमार।
पाँव पिछाडी को ना धरियो। यारौ रखियो धर्म हमार॥
सन्मुख लडिकै जो मरि जैहो। हृइहै जुगन-जुगन लौं नाम।
दै-दै पानी रजपूतन को। ऊदनि आगे दियो बढाय॥
झुके सिपाही महुबे वारे। जिनके मार-मार रट लागि।
यहाँ कि बातैं तो यहाँ छोडो। अब आगे के सुनो हवाल॥
लाखिन बोले पृथीराज ते। तुम सुनि लेउ वीर चौहान।
है कोउ क्षत्री तुम्हारे दल में। सन्मुख लडै हमारे साथ॥

यह सुनि पिरथी बोलन लागे। लाखनि सुनो हमारी बात।
बारह रानिन के इकलाता। औ सोलै के सर्व सिंगार॥
आस लकडिया हौ जैचंद की। नाहक देहौ प्राण गँवाय।
कही हमारी लाखनि मानौ। तुम समुहे ते जाउ बराय॥
घुंडी खोली तब लाखनि ने। समुहे छाति दई अडाय।
बोले लाखनि पृथीराज ते। तुम सुनि लेउ पिथौरा राय॥
हिरणाकुश सतयुग में हृइगौ। जाने कियो अखंडित राज।
सो ना अमर भयो पृथवी पर। अब क्या अमर कनौजीराय॥
द्वापर में राजा दुर्योधन। हृइगै बहुत बली सरनाम।
सोनहिं अमर भये धरती पर। अब क्या अमर कनौजीराय॥

प्रस्तुतिः डॉ. मधु चतुर्वेदी

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