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Monday, February 22, 2010

अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूं तो चलूँ

आज कल ब्लॉग देख कर बहुत आनंद आ रहा है। इतनी विविधता आती जा रही है कि ब्लॉग देखे बिना चैन नहीं मिलता। जगनिक की आल्हा पढवा कर मधु जी ने बड़ा पावन कार्य किया है। इसको पढ़ कर सन ६०-६१ में पहुँच गया, जब होलीपुरा में सारे गाँव के लोग इकठ्ठे हो कर आल्हा सुनते थे। सुनाने वाला इस क़दर जोश भर देता था लोगों में कि लोग उछल पड़ते थे। बहुत दिनों बाद वीरेन्द्र मिश्र को पढ़ कर बेहद ख़ुशी हुई। दोनों प्रस्तुत कर्ताओं को साधुवाद। आज मोईन अहसन जज़्बी की एक ग़ज़ल पेश है।
अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूँ तो चलूँ
अपने ग़मखाने में इक धूम मचा लूँ तो चलूँ
और इक जामे-मये-तल्ख़ चढ़ा लूँ तो चलूँ
अभी चलता हूँ, ज़रा ख़ुद को संभालूं तो चलूँ।

जाने कब पी थी, अभी तक है मये-ग़म का ख़ुमार
धुंधला धुंधला सा नज़र आता है जहाने- बेदार
आंधियां चलतीं हैं, दुनिया हुई जाती है ग़ुबार
आँख तो मल लूँ, ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँ।

वो मेरा साहिर, वो एजाज़ कहाँ है लाना
मेरी खोई हुई आवाज़ कहाँ है लाना
मेरा टूटा हुआ वो साज़ कहाँ है लाना
इक ज़रा गीत भी, इस साज़ पे गा लूँ तो चलूँ।

मैं थका हारा था, इतने में जो आए बादल
किसी मतवाले ने चुपके से बढ़ा दी बोतल
उफ़ वो रंगीन पुर-असरार ख़यालों के महल
ऐसे दो चार महल और बना लूँ तो चलूँ।
मृगेन्द्र मक़बूल

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