भाई ज्ञानेंद्र चतुर्वेदी का ब्लॉग पर औपचारिक रूप से स्वागत है, हालां कि मुझे पता है कि ब्लॉग से वो काफी समय से जुड़े हुए हैं। प० सुरेश नीरव, हंस जी और ज्ञानेंद्र जी का मैं तहे- दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्हों ने मेरी प्रस्तुति को सराह कर मेरी हौसला अफज़ाई की है। आज बशीर बद्र की एक ग़ज़ल पेश है।
न जी भर के देखा, न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की।
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की।
उजालों की परियां नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की।
मैं चुप था, तो चलती हवा रुक गई
ज़बां सब समझते हैं जज़्बात की।
सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफिर ने जाने कहाँ रात की।
मुक़द्दर मेरे चश्मे- पुरआब का
बरसती हुई रात बरसात की।
मृगेन्द्र मक़बूल
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