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Saturday, February 20, 2010

सागर के सब जिव

अग्येय और गुलजार को पढ़ कर लगा जैसे साहित्य की दुनिया में घूम रहा हूं। नजरों के सामने आज से बीस-तीस बरस पहले की कविताएं स्मरण हो आईं। लगा मैं भी कुछ फिर से लिखूं-
बड़वानल सा झुलस रहें हैं सागर के सब जीवजीवन ऊब रहा अपना है
ज्यों बहता हो पीबमन ही मन मोदक हैं खाएंपर शक्कर का रोग न भाएगले हुए कच्चे ईंटों सेबना रहे हम
नींवव्यथ$ साधना गई
हमारीफिर भी छाई रही खुमारीदावानल से धधकते वन मेंखोज रहे क्यों जीव?
अशोक मनोरम

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