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Saturday, February 20, 2010

अज्ञेयजी की कविताएं

सचिद्दानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेयजी की कविताएं
अग्निवीणा



जन्म: 07 मार्च 1911
निधन: 1987

उपनामअज्ञेय
जन्म स्थानकुशीनगर, देवरिया जिला, उत्तर प्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ
हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार
विविध कितनी नावों में कितनी बार नामक काव्य संग्रह के लिये 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। आँगन के पार द्वार के लिये 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनीअज्ञेय / परिचय
आ गये प्रियंवद ! केशकम्बली ! गुफा-गेह !
राजा ने आसन दिया। कहा :
"कृतकृत्य हुआ मैं तात ! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझ को
साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी !"

लघु संकेत समझ राजा का
गण दौड़े ! लाये असाध्य वीणा,
साधक के आगे रख उसको, हट गये।
सभा की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
प्रियंवद के चेहरे पर।

"यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से
--घने वनों में जहाँ व्रत करते हैं व्रतचारी --
बहुत समय पहले आयी थी।
पूरा तो इतिहास न जान सके हम :
किन्तु सुना है
वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस
अति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढा़ था --
उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
कंधों पर बादल सोते थे,
उसकी करि-शुंडों सी डालें

चित्र:Vichitra Veena1.jpg

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