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Monday, February 22, 2010

...शजर क्या करते

अब भला छोड़ के घर क्या करते
शाम के वक्त सफ़र क्या करते

तेरी मसरूफियाँ जानते थे
अपने आने की खबर क्या करते

जब सितारे ही नहीं मिल पाए
ले के हम शम्स-ओ-कमर क्या करते

वो मुसाफिर ही खुली धूप का था
साये फैला के शजर क्या करते

खाक ही अव्वल -ओ-आखिर ठहरी
कर के जर्रे को गौहर क्या करते

राय पहले से ही बना ली तूने
दिल में अब हम तेरे घर क्या करते

इश्क ने सारे सलीके बख्शे
हुस्न से कस्ब-ए- हुनर क्या करते


प्रस्तुति: अनिल (२२.०२.२०१० अप ३.०० बजे )

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