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Sunday, February 21, 2010

व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया।


  सुकवि वीरेन्द्र मिश्र का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूं
जन्म: 1928


जन्म स्थानमुरैना, मध्यप्रदेश
कुछ प्रमुख
कृतियाँ
गीतम, अविराम चल मधुवंती, लेखनी बेला, झुलसा है छायानट धूप में, काले मेघा पानी दे तथा शांति गंधर्व (सभी नवगीत संग्रह)
विविध’नवगीत’ के प्रमुख हस्ताक्षर। इन्हें 'देव’ पुरस्कार एवं 'निराला’ पुरस्कार प्राप्त हुए ।

पत्र कई आए
पर जिसको आना था
वह नहीं आया

- व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया।
सहन में फिर उतरा पीला-सा हाशिया
साधों पर पाँव धरे चला गया डाकिया
और रोज़-जैसा
मटमैला दिन गुज़रा
गीत नहीं गाया

- व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया।

भरे इंतज़ारों से एक और गठरी
रह-रहकर ऊंघ रही है पटेल नगरी

अधलिखी मुखरता
कह ही तो गई वाह!
ख़ूब गुनगुनाया

-व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया।

खिडकी मैं बैठा जो गीत है पुराना
देख रहा पत्रों का उड़ रहा खज़ाना

पूछ रहा मुझसे
पतझर के पत्तों में
कौन है पराया

- व्यंग्य किए चली गई धूप और छाया।
वीरेन्द्र मिश्र
प्रस्तुतिः सुरेश नीरव

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