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Sunday, February 21, 2010

बस नूर तेरा ...

तू है शिल्पी नियंता गजब जादूगर

कल्पना तेरी अद्भुत है रचना सुहानी

जिधर जाती दृष्टि है बस नूर तेरा

अजब तेरी कारीगरी मन लुभानी

है तेरी ही रचना वह गंगा का पानी

गंगोत्री में फूटा औ नीचे को आया

चलता गया बस वो बढ़ता गया

कहीं ना रुका वो थी उसपे रवानी

वह प्रियतम से मिलने को बेचैन था

मिलके उसमें ही खोने को बेताब था

लक्ष्य उँचा बड़ा मंज़िल दूर थी

सो चलता गया वह बढ़ता गया

लंबा सफ़र पार करके नदी की, हुई

भेंट प्रियतम से अंतिम घड़ी में

थी जितनी तमन्ना प्रिया को मिलन की

प्रतीक्षा थी प्रियतम को भी उसकी उतनी

सो हसरत लिए वह भी राह तक रहा था

कब आए प्रिया वह करे उसका स्वागत

लगा ले गले से औ ले चूम तन -मन

तभी लंबी यात्रा की हारी-थकी

प्रिया पहुँची प्रियतम के द्वार पर

देख प्रिय की छवि अति हर्षित हुआ

पसारी भुजाएँ औ स्वागत किया

किया उसने आलिंगन फिर प्यार से

इक दूजे में खो गये सदा के लिए

चिरंतन हुआ उनका मधु मिलन

प्रिया खो गई प्रिय के आगोश में

सब कुछ मिल गया था मिलन में वहाँ

ना वहाँ शान थी उसकी ना नाम था

पर अमरता मिली उसको थी प्यार की

औ वहाँ था निरंतन समर्पण बचा

कैसा अद्भुत मिलन गंगा सागर का है

हो सका ये मिलन क्योंकि मर्ज़ी तेरी थी

कल्पना ये तेरी रचना भी तेरी थी

तू है शिल्पी नियंता गजब जादूगर

कल्पना तेरी अद्भुत है रचना सुहानी

-वेदना उपाध्याय

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