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Sunday, February 21, 2010

...बदन में शब को रही


न कर शुमार कि हर शै गिनी नहीं जाती

ये जिंदगी है हिसाबों से जी नहीं जाती


ये नर्म लहजा, ये रंगीनी-ए-बयान, ये खुलूस

मगर लड़ाई तो ऐसे लड़ी नहीं जाती

सुलगते दिन में थी बाहर, बदन में शब को रही

बिछड़ के मुझसे बस एक तीरगी नहीं जाती


नकाब डाल दो जलते उदास सूरज पर

अँधेरे जिस्म में क्यूँ रोशनी नहीं जाती


हर एक राह सुलगते हुए मनाजिर हैं

मगर ये बात किसी से कही नहीं जाती


मचलते पानी में ऊंचाई की तलाश फुजूल है

पहाड़ पर तो कोई भी नदी नहीं जाती

प्रस्तुति: अनिल (२२.०२.२०१० अप १२.१५ बजे )

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