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Sunday, February 21, 2010

जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदम गौंडवी
मधु मिश्रा
आजकल जय लोकमंगल में साहित्य की बहार आई हुई है। एक-सेबढ़कर-एक कवियों की रचनाएं पढ़ने को मिल रही हैं। हंसजी राशिफल दे रहे हैं तो मकबूलजी और अनिलजी नियमित गजल लिख रहे हैं। अशोक मनोरम की रचना भी पढ़ने को मिल जाती है। अरविंद पथिक जी ने बिस्मिलजी की रचनाएं पढ़वाईं, सभी को धन्यवाद। ऐक साथ दो ज्ञानेन्द्र जिस ब्लॉग पर हों उस ब्लॉग के क्या कहने। आज मैं भी अवदान कर रही हूं,अदम गौंडवी की रचना देकर-

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

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