दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खूब लिखता है
कहीं पर बेवफा तो कहीं मुझे महबूब लिखता है
कुछ तो रस्म-ए-वफ़ा निभा रहा है वो
हर एक सफ- ए-कहानी में वो मुझे मजमून लिखता है
लफ़्ज़ों की जुस्तजू मेरे संग बीते लम्हों से लेता है
स्याही मेरे अश्क को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है
कशिश क्यों न हो उसकी दास्ताँ-ए -दर्द में यारों
जब भी जिक्र खुद का आता है वो खुद को वफ़ा लिखता है
तहरीरें झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर
खुद को दर्द का मसीहा और कहीं मजबूर लिखता है ...
प्रस्तुति: अनिल (11।02.2010 अप १२.०० बजे )
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