कुछ तो पांवों की ख़ता थी, कुछ था राहों का क़ुसूर
मंज़िलों की बात क्या, हम हो गए ख़ुद से भी दूर।
ज़िन्दगी में जो किया, आधा- अधूरा ही किया
आधा पैमाना पिया, होना था आधा ही सुरूर।
सारे कामों की सदा होती रही आलोचना
और हम करते रहे, अपनी कुशलता का गुरूर।
देख अधरों पर हंसी, समझे हमें सब खुशनसीब
आपने झांका कहाँ है, मेरी आँखों में हुज़ूर।
लोग कहते हैं कि कुछ दिन और रुक जाओ पराग
आ चुके हैं दूर इतनी, अब तो जाना है ज़रूर।
ओ० पी० चतुर्वेदी पराग
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
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