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Wednesday, February 3, 2010

समंदर दिल में मगर होठों पर अंगार रखता है

समंदर दिल में मगर होठों पर अंगार रखता है
अजीब कैफ़ियत iस दौर का ख़ुद्दार रखता है।

दिलों की सल्तनत पर राज करता है फ़कीरे-दिल
न रजधानी, न तख्तो-ताज, न दरबार रखता है।

अदाकारी, गुनहगारी, हो बदकारी या मक्कारी
वो नेता है, वो अपने पास सब औज़ार रखता है।

सजी हैं सूचनाओं की दुकानें सब तरफ लेकिन
कहाँ अब सुर्ख़ियों में धार वो अखबार रखता है।

तेरे अश्कों की आहट गूंजती है मेरी आँखों में
मरासिम कुछ तो तेरे दिल से मेरा प्यार रखता है।

ए दुनिया क्यूँ न अपनी ठोकरों में तुझको वो रखे
जो अपने भीतर, तुझसे बेहतर इक संसार रखता है।

फ़ना कर डाले फ़न के वास्ते ख़ुद अपनी हस्ती को
य कुव्वत तो जिगर वाला कोई फ़नकार रखता है।
कुमार नवीन
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

4 comments:

kishore ghildiyal said...

bahut khoob va bahut hi achha

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया गजल प्रेषित की है।बधाई।

दिलों की सल्तनत पर राज करता है फ़कीरे-दिल
न रजधानी, न तख्तो-ताज, न दरबार रखता है।

नीरज गोस्वामी said...

अदाकारी, गुनहगारी, हो बदकारी या मक्कारी
वो नेता है, वो अपने पास सब औज़ार रखता है।

नवीन जी की इस लाजवाब ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए आप के हम सब आभारी हैं मकबूल जी...हर शेर कमाल का है..दिली दाद दे रहे हैं...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

ए दुनिया क्यूँ न अपनी ठोकरों में तुझको वो रखे
जो अपने भीतर, तुझसे बेहतर इक संसार रखता है।

ग़ज़ब के तेवर हैं जनाब .......... सुभान अल्ला ......... बचा कर रखिएगा दुनिया की नज़रों से ............