चंद वोटों की खातिर बेवजह 'मराठी मानुस' का राग अलापने वाले 'मराठियों के तथाकथित स्वयंभू हितैषियों' को दरअसल आम मराठी से कुछ लेना-देना नहीं हैं। राज ठाकरे के हाथों चुनावों में पटखनी खाने के बाद बाल ठाकरे को लगा कि मराठी का मुद्दा राज ठाकरे से छीने बिना महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की चुनौती बनाये रखना कठिन होगा , बस लग गए खुद को मराठियों को सबसे बड़ा ठेकेदार साबित करने में। यह विवाद खुद को सबसे बड़ा मराठियों का हितैषी साबित करने की चाचा-भतीजे की होड़ का परिणाम है। बाल ठाकरे को खुद मैंदान में इसलिए उतरना पड़ा क्योंकि वो जानते हैं कि उद्दव ठाकरे राज को टक्कर नहीं दे सकते, वर्ना वो तो 'मातो श्री' में आराम कर रहे थे।
मजे की बात ये है कि जिस मराठी मानुस की वो बात कर रहे हैं उस की इस विवाद पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं है। आज़ादी के बाद से ही महाराष्ट्र में देश भर के लोग रह और काम कर रहे हैं। तब से किसी मराठी को कोई आपत्ति नहीं हुई , खुद बाल ठाकरे को , जब वो अपने पूरे जलवे पर थे , इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन अब राज ठाकरे से बड़ा मराठियों का भला - मानुस बन कर दिखाना है तो ये सब तो करना ही होगा न ।
आई पी एल के बहाने से ठाकरे & फॅमिली को इस मुद्दे को हवा देने को मौका मिल गया।
मुकेश अम्बानी ने 'मुबई हर भारतवासी की है ' कह दिया तो ठाकरे साहब को तैश आ गया और मुकेश अम्बानी को अपना बिजनेस करने की नसीहत दे डाली। जबकि ये कोई छिपी हुई बात नहीं है कि चुनावों में कमोबेश सभी राजनीतिक दल उधोगपतियों से ही चंदा उगाहते हैं । राहुल गाँधी राजनीति के मैदान में अभी अपरिपक्व हैं । उत्तर भारतियों के समर्थन में उनकी टिपण्णी के जवाब में जो कुछ भी बाल ठाकरे ने कहा वो उनकी ढलती उम्र और बिगड़ते मानसिक संतुलन का ही परिचायक है। शाहरुख़ खान ने पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों की प्रशंसा क्या कर डाली , ठाकरे साहब उबल पड़े। शाहरुख़ खान को खरी-खोटी सुना दी, उनकी फिल्म न चलने देने की धमकी दे दी। अरे भाई, टेलेंट के बल पर ही तो पाकिस्तान २०-२० चैम्पियन बना ... और ये बात तो सब मानेंगे कि खेलों को राजनीति से अलग रखना चाहिए।
उधर राज साहब कहते हैं कि नौकरियों में मराठियों को ही लिया जाये। टैक्सियाँ भी मराठी ही चलाएंगे । ज़नाब से पूछा जाये अगर महाराष्ट्र से सारे गैर-मराठी उद्योग, बिजनेस , शिक्षण संस्थान , अस्पताल , सिनेमा और लोग निकल जाएँ तो वहां बचेगा क्या? वैसे भी संविधान ने हर भारतीय नागरिक को कहीं भी रहने और अपनी आजीविका कमाने का अधिकार दिया है तो ठाकरे & फैमली कौन होती है किसी को मुंबई या महाराष्ट्र में रहने पर ऐतराज करने वाली? क्या ये परिवार संविधान से भी ऊपर है? ठाकरे साहेब मुबई किसी की जागीर नहीं है। खुद को मुंबई का भगवान् समझना बंद कीजिये और आम मराठी के लिए कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कीजिये कि कोई मराठी भूखा न सोये और कोई ज़रूरतमंद मराठी गरीबी की वजह से बे-इलाज दम न तोड़े।
अनिल (04।02.2010 अप १.३० बजे )
मजे की बात ये है कि जिस मराठी मानुस की वो बात कर रहे हैं उस की इस विवाद पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं है। आज़ादी के बाद से ही महाराष्ट्र में देश भर के लोग रह और काम कर रहे हैं। तब से किसी मराठी को कोई आपत्ति नहीं हुई , खुद बाल ठाकरे को , जब वो अपने पूरे जलवे पर थे , इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन अब राज ठाकरे से बड़ा मराठियों का भला - मानुस बन कर दिखाना है तो ये सब तो करना ही होगा न ।
आई पी एल के बहाने से ठाकरे & फॅमिली को इस मुद्दे को हवा देने को मौका मिल गया।
मुकेश अम्बानी ने 'मुबई हर भारतवासी की है ' कह दिया तो ठाकरे साहब को तैश आ गया और मुकेश अम्बानी को अपना बिजनेस करने की नसीहत दे डाली। जबकि ये कोई छिपी हुई बात नहीं है कि चुनावों में कमोबेश सभी राजनीतिक दल उधोगपतियों से ही चंदा उगाहते हैं । राहुल गाँधी राजनीति के मैदान में अभी अपरिपक्व हैं । उत्तर भारतियों के समर्थन में उनकी टिपण्णी के जवाब में जो कुछ भी बाल ठाकरे ने कहा वो उनकी ढलती उम्र और बिगड़ते मानसिक संतुलन का ही परिचायक है। शाहरुख़ खान ने पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों की प्रशंसा क्या कर डाली , ठाकरे साहब उबल पड़े। शाहरुख़ खान को खरी-खोटी सुना दी, उनकी फिल्म न चलने देने की धमकी दे दी। अरे भाई, टेलेंट के बल पर ही तो पाकिस्तान २०-२० चैम्पियन बना ... और ये बात तो सब मानेंगे कि खेलों को राजनीति से अलग रखना चाहिए।
उधर राज साहब कहते हैं कि नौकरियों में मराठियों को ही लिया जाये। टैक्सियाँ भी मराठी ही चलाएंगे । ज़नाब से पूछा जाये अगर महाराष्ट्र से सारे गैर-मराठी उद्योग, बिजनेस , शिक्षण संस्थान , अस्पताल , सिनेमा और लोग निकल जाएँ तो वहां बचेगा क्या? वैसे भी संविधान ने हर भारतीय नागरिक को कहीं भी रहने और अपनी आजीविका कमाने का अधिकार दिया है तो ठाकरे & फैमली कौन होती है किसी को मुंबई या महाराष्ट्र में रहने पर ऐतराज करने वाली? क्या ये परिवार संविधान से भी ऊपर है? ठाकरे साहेब मुबई किसी की जागीर नहीं है। खुद को मुंबई का भगवान् समझना बंद कीजिये और आम मराठी के लिए कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कीजिये कि कोई मराठी भूखा न सोये और कोई ज़रूरतमंद मराठी गरीबी की वजह से बे-इलाज दम न तोड़े।
अनिल (04।02.2010 अप १.३० बजे )
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